

आज आप जिसे प्रान्ति इंडिया के नाम से जानते हैं, इसे शुरुआती दिनों में प्रान्ति समूह के नाम से भी जाना जाता था। यह नामकरण इस संगठन के शुरुआती दिनों की एक महत्वपूर्ण याद दिलाता है, जब यह एक छोटे से समूह के रूप में शुरू हुआ था। वो चंद साहित्यकारों की टोली ने एक समूह बनाया, जिनके बीच साहित्य, संस्कृति और भाषा के प्रति गहरा प्रेम और समर्पण था। इस समूह ने मिलकर प्रान्ति इंडिया को एक मंच के रूप में स्थापित किया, जहां वे अपनी रचनाओं को साझा कर सकते थे और साहित्यिक गतिविधियों में भाग ले सकते थे। समय के साथ, प्रान्ति इंडिया ने अपनी जड़ें गहरी कर लीं और एक प्रमुख साहित्यिक संगठन के रूप में उभरा। आज, यह संगठन न केवल साहित्यकारों के लिए एक मंच प्रदान करता है, बल्कि साहित्य, संस्कृति और भाषा के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए भी काम करता है। इन सभी गतिविधियों में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले लोगों की रही, जिन्होंने अपने समय, ऊर्जा और प्रतिभा को निस्वार्थ रूप से समर्पित किया। ये लोग प्रेरणा के स्रोत थे, जिन्होंने अपने जुनून और समर्पण से प्रेरित करते हुए, प्रान्ति इंडिया को एक सफल और प्रभावशाली संगठन में परिवर्तित किया। इनमें से कुछ प्रमुख व्यक्तियों में से एक हैं श्री ए.के. प्रसाद, जिन्होंने अपने नेतृत्व और मार्गदर्शन से प्रान्ति इंडिया को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया। उनकी दूरदर्शिता और समर्पण ने संगठन को एक मजबूत आधार प्रदान किया और इसकी वृद्धि में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। शुरुआती दिनों में, प्रान्ति इंडिया के सदस्यों ने साझा संग्रहों का प्रकाशन किया, जिसमें उनकी रचनाएँ और लेख शामिल थे। ये संग्रह न केवल सदस्यों के लिए एक मंच प्रदान करते थे, बल्कि साहित्यिक गतिविधियों को बढ़ावा देने और पाठकों के साथ जुड़ने का एक तरीका भी था। इन साझा संग्रहों में कविताएँ, कहानियाँ, निबंध और अन्य साहित्यिक रचनाएँ शामिल थीं। ये संग्रह प्रान्ति इंडिया के सदस्यों की प्रतिभा और रचनात्मकता को प्रदर्शित करने का एक तरीका था, और संगठन के उद्देश्यों को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। महंगी प्रकाशन व्यवस्था की वजह से साहित्यकारों ने आपसी सहयोग से साझा संग्रहों का प्रकाशन जारी रखा, जिससे वे अपनी रचनाओं को पाठकों तक पहुंचा सकें। यह एक अनोखा और प्रभावी तरीका था, जिससे साहित्यकार अपनी रचनाओं को प्रकाशित कर सकते थे, बिना किसी आर्थिक बोझ के। इस प्रकार, प्रान्ति इंडिया के सदस्यों ने साझा संग्रहों के माध्यम से साहित्यिक गतिविधियों को बढ़ावा देने और अपनी रचनाओं को पाठकों तक पहुंचाने का एक सफल मॉडल विकसित किया। समय बीतने के साथ इसी कार्यकारिणी की एक मीटिंग में विचार-विमर्श हुआ कि वर्तमान परिवेश में प्रकाशन व्यवसाय की व्यवस्था कितनी विस्तृत व महंगी हो गयी है। आजकल तो लेखक बनने की इच्छा रखने वाले हर रचनाकार का शुरुआती मन इस दुविधा से जूझता ही है कि यात्रा का प्रारंभ किस प्रकार किया जाए ? सबसे पहले किस प्रकाशक के पास जाया जाए ? यह कैसे सुनिश्चित किया जाए कि रचनाएं छप ही जाएगी ? यदि कहीं गलत जगह नवांकुर अपनी पांडुलिपि और पैसा देकर फंस गया तो फिर किसी और प्रकाशक पर विश्वास कर पुनः प्रयास करना उसके लिए मुश्किल हो जाता है। इस विचार-विमर्श के दौरान, कार्यकारिणी के सदस्यों ने यह महसूस किया कि नए लेखकों के लिए प्रकाशन की दुनिया में प्रवेश करना कितना कठिन हो सकता है। उन्होंने यह भी महसूस किया कि कई नए लेखक अपनी रचनाओं को प्रकाशित करने के लिए संघर्ष करते हैं, क्योंकि उन्हें प्रकाशन की प्रक्रिया के बारे में जानकारी नहीं होती है या उन्हें प्रकाशकों द्वारा ठगा जा सकता है। और फिर एकबार साहित्यकारों के मन में सुझाव आया कि क्यों न अपने यहां प्रकाशन की व्यवस्था हो। यह विचार साहित्यकारों के बीच चर्चा का विषय बन गया और जल्द ही, उन्होंने इस दिशा में काम करना शुरू कर दिया। इन साहित्यकारों ने मिलकर प्रकाशन व्यवस्था का विकास किया, जिससे वे अपनी रचनाओं को स्वतंत्र रूप से प्रकाशित कर सकें। इस प्रकार, प्रान्ति इंडिया ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाया और अपने साहित्यकारों को एक नई दिशा प्रदान की। फिर, एक दिन मीटिंग के दौरान यह निर्णय लिया गया कि मासिक पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया जाए। यह निर्णय प्रान्ति इंडिया के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हुआ। इन साहित्यकारों ने मिलकर एक कार्यकारिणी बनाई गई और पत्रिका के लिए आवश्यक कागजी कार्रवाई पूरी की। इस प्रक्रिया में सभी सदस्यों ने सक्रिय रूप से भाग लिया और अपने विचारों और सुझावों को साझा किया। पत्रिका की शुरुआत के लिए एक संपादक की आवश्यकता थी, और इस जिम्मेदारी को सर्वसम्मति से ए. के. प्रसाद को सौंपा गया। उनकी साहित्यिक प्रतिभा, अनुभव और नेतृत्व क्षमता ने उन्हें इस पद के लिए एक आदर्श उम्मीदवार बनाया। ए. के. प्रसाद के संपादकत्व में पत्रिका की शुरुआत एक नए युग की शुरुआत थी, जिसमें साहित्य, संस्कृति और समाज से जुड़े विभिन्न विषयों पर गहराई से चर्चा और विचार-विमर्श किया जाने वाला था।
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